नाथ शंभु धन भंज निहारा हुहिए, कोई एक दास तुम्हारा
वाराणसी। अखिल भारतीय सनातन समिति जैतपुरा द्वारा आयोजित रामकथा के छठवे दिन अपने कथा प्रवचन में पूज्य संत बालक दास जी महाराज मानस मराल ने कहा कि शिव जी के धनुष टूटने पर जो आकाश में गर्जना हुई। इसे सुनकर स्वयंवर स्थल पर मुनिराज परशुराम जी बड़े ही क्रोध में आकर उन्होंने राजा जनक से पूछा कि इस धनुष को किसने तोड़ा वह तुरंत मेरे सामने आ जाए नहीं तो मैं इस फरसे से सारे राजाओं का सिर शरीर से अलग कर दूंगा। यह देख कर भैया लक्ष्मण जी ने मुनीवर से इस धनुष से इतना उनका लगाव क्यों है यह जानना चाहा तो और क्रोध से लाल हो गए तथा उन्होंने इस बालक को तुरंत राज समाज से अलग करने को कहा। काफी मान मनोबल के बाद प्रभु श्री राम ने उन्हें दंडवत प्रणाम करते हुए कहा कि हे मुनिराज बालक पर इस प्रकार क्रोध आपको शोभा नहीं देता, तब परशुराम जी और क्रोध में आकर उन्होंने स्वयं प्रभु राम को युद्ध करने की चुनौती दे डाली। तब गुरु विश्वामित्र ने मुनिवर को राम को स्वयं ब्रह्म का अवतार बतला कर उनके क्रोध को शांत कराया। इसके बाद अयोध्या में राजा जनक के दूत जाकर महाराज दशरथ को स्वयंवर की पूरी जानकारी बताई, तब खुशी-खुशी राजा दशरथ अपने दो पुत्रों भरत शत्रुघ्न को पूरे शान शौकत के साथ गुरु वशिष्ट के नेतृत्व में बारात लेकर जनकपुर के लिए चल पड़े, वहां चारों भाइयों का विधिवत विवाह संपन्न हुआ। यह दृश्य देखकर पूरा पंडाल राजा रामचंद्र की जय, चारों भईयन की जय के जयकारों से भक्तगणो में उल्लास भर उठा।

