साहित्यकार स्थापनाओं स्वीकारते नहीं बल्कि विचारों से टकराते हैं- प्रो रामेश्वर राय
ब्यूरो चीफ आनंद सिंह अन्ना
वाराणसी। दिनांक 22 सितम्बर, केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान और महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट तथा भाषा संस्थान उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को महाकवि जयशंकर प्रसाद और मुंशी प्रेमचंद -"हिंदी साहित्य के दो मित्रवत स्तंभ" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन तिब्बती संस्थान के अनाद पिंडद सभागार में हुआ।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रुप में बोलते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामेश्वर राय ने कहा कि साहित्यकार का काम समाज की स्थापनाओं को स्वीकार करना नहीं है बल्कि विचारों से टकराना है। दृष्टि और आकांक्षा दोनों मिलकर जीवन दर्शन का निर्माण करते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रसाद भाव के स्तर पर संपूर्ण भारतीय वांग्मय परंपरा के आधार पर साहित्य का सर्जन करते हैं वही प्रेमचंद जीवन के सत्य को अपने साहित्य में उकेरते हैं अर्थात समाज के जिस नग्न यथार्थ उन्होंने आंखों से देखा था उसको ही उन्होंने अपने साहित्य में उकेरा।
कार्यक्रम की प्रस्तावना पर बोलते हुए प्रोफेसर राम सुधार सिंह ने कहा कि प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में गुलामी की दास्तां से मुक्ति का सवाल खड़ा होता है। उनका साहित्य मानवता की दृष्टि एवं समानता के सवालों को भी सामने रखता है। उनकी रचनाएं मानवता की विजय का स्रोत है।
कार्यक्रम में उपाध्यक्ष के रूप में बोलते हुए संस्थान की कुल सचिव डॉक्टर सुनीता चंद्रा ने कहा कि प्रसाद की रचनाओं में जहां इतिहास और संस्कृति को आधार बनाकर वसुधैव कुटुंबकम की कामना है वहीं प्रेमचंद की रचनाओं में समाज की सच्चाई को आधार बनाया गया है, जिसमें नारी, किसान, मजदूर और सर्वहारा समाज है। वह सामाजिक समरसता के हिमायती रचनाकार हैं।
अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रोफेसर डब्लू डी नेगी ने कहा कि प्रसाद की रचनाओं में बौद्ध दर्शन का प्रभाव दिखता है। इसीलिए उनकी रचनाओं में विश्व कल्याण, अहिंसा, करुणा, मानवता, दया और राष्ट्रीय चेतना है। उनका मानना था कि विश्व में शांति युद्ध से नहीं बल्कि बुद्ध से अहिंसा से और प्रेम से ही स्थापित किया जा सकता है जबकि प्रेमचंद की रचनाओं में एक अलग तरह की बेचैनी एक तरह की छटपटाहट है। दोनों रचनाकारों का उद्देश्य एक ही है लेकिन रास्ते अलग-अलग हैं।
प्रथम सत्र में डॉक्टर प्रवीण कुमार ने कहा कि प्रेमचंद तथा जयशंकर प्रसाद मनुष्य के दायित्व बोध के रचनाकार है। डॉ सुमन जैन ने कहा कि इन दोनों रचनाकारों के साहित्य का आजादी के आंदोलन और नवजागरण में अहम भूमिका रही। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के निदेशक राजेश गौतम ने कहा कि जयशंकर प्रसाद का संपूर्ण साहित्य भारतीय वांग्मय परंपरा का आर्ष साहित्य है।
प्रोफेसर श्रद्धानंद ने कहा कि प्रसाद और प्रेमचंद का साहित्य भाषा, सामाजिक चेतना, संस्कृति, राष्ट्रीय एवं मानवीय चेतना की दृष्टि से समान है। डॉक्टर दयानिधि मिश्र ने कहा कि प्रसाद का साहित्य सत्यम, शिवम्, सुंदरम का संदेश देने वाला है जबकि प्रेमचंद का साहित्य सामाजिक यथार्थ का साहित्य।
कार्यक्रम का संचालन डॉ अनुराग त्रिपाठी ने तथा स्वागत संबोधन डॉक्टर सरिता प्रसाद व धन्यवाद ज्ञापन अवधेश गुप्ता ने किया। दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश भर के शोधकर्ताओं ने सहभागिता की।इस अवसर पर डॉक्टर प्रशांत मौर्य, प्रो उमेश चंद्र सिंह, सुनील कुमार, राजेश कुमार मिश्रा, उप कुलसचिव डॉ हिमांशु पांडे, रवि रंजन द्विवेदी सहित सैकड़ो की संख्या में छात्र-छात्राएं एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
