Kashi ka News. सनातन धर्म में माता-पिता का सेवा सर्वोत्तम कार्य-ज्योतिषाचार्य मोहन मिश्रा

 सनातन धर्म में माता-पिता का सेवा सर्वोत्तम कार्य- ज्योतिषाचार्य मोहन मिश्रा 

ब्यूरो चीफ़ आनंद सिंह अन्ना 

वाराणसी। सनातन धर्म में माता पिता की सेवा को सर्वोत्तम कार्य माना जाता है। भारतवर्ष में परिवार नामक संस्था का महत्व और पारिवारिक बंधन इतना सुदृढ़ इसलिए है कि हमारे पूर्वज ऋषियों ने इसके लिए कुछ नियम बनाए हैं जिनका अपना धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। इन्हीं में से एक है पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण करना। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक एक पक्ष को पितृपक्ष कहते हैं। इसमें अपने पित्र की मृत्युतिथि को उनका तर्पण किया जाता है। श्रद्धा से किए गए इस तर्पण को हीं श्राद्ध कहते हैं। इसके महत्व के बारे में गरुण पुराण में भी वर्णन है।उक्त जानकारी ज्योतिषाचार्य मोहन मिश्रा ने दी। उन्होंने बताया कि महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि श्राद्ध कर्म से धर्म, यश, और पुत्र प्राप्ति होती है। इसकी शुरुआत कहां से हुई इसके बारे में भीष्म पितामह बताते हैं कि हे युधिष्ठिर परमपिता ब्रह्मा जी से महर्षि अत्री उत्पन्न हुए, उन्हीं के वंशज भगवान दत्तात्रेय से निमी और निमी की संतान श्रीमान हुए। श्रीमान महान तपस्वी थे। वर्षों तपस्या करके उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इससे निमी बहुत दुखी हुए उन्होंने अपने पुत्र का दाह संस्कार किया। इसके बाद आश्विन शुक्ल पक्ष के चौदहवें दिन उन्होंने अपने पुत्र के दैनिक उपयोग की वस्तुएं और उनके पसंद के फल, अन्न एकत्रित करके सात ब्राह्मणों को बुलाया और उन्हें कुशा के आसान पर बिठा कर दक्षिण दिशा में मुंह करके अपने पुत्र का तर्पण किया। फिर ब्राम्हणों को भोजन कराया। परन्तु बाद में उनके मन में शंका हुई कि यह कार्य तो पुत्र का है क्या पिता के तर्पण से उन्हें मोक्ष प्राप्त होगा? कहीं मैने यह नियम विरुद्ध कार्य तो नहीं कर दिया। तब उन्होंने अपने पूर्वज महर्षि अत्री का आह्वान किया। महर्षि अत्री वहां आए और कहा कि हे पुत्र तुमने नियम विरुद्ध कोई कार्य नहीं किया है, ये नियम ब्रह्मा जी द्वारा हीं बनाया गया है। ब्रह्माजी ने पितृ श्राद्ध के लिए कुछ देवता भी बनाए हैं जिन्हें पितृदेव कहा जाता है। प्रमुख पितृदेव अर्यमा हैं। अग्नि, वरुण , सोम भी पितृ देव हैं। इसलिए श्राद्ध में इनका भाग नियत किया गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण-हम जानते हैं कि किसी जीवधारी के शरीर की प्राथमिक इकाई कोशिका से बना है। कोशिका विभाजन के समय माता और पिता के डीएनए अर्थात डाइ आँक्सीराइबोज न्यूक्लिक एसिड आपस में मिलकर नई कोशिका बनाते हैं। अब इस तरह दो चैनल हुए एक मैटरनल और एक पैटरनल, इसी को हमारे शास्त्र कहते हैं पिता का रक्त संबंध और माता का दुग्ध संबंध। रक्त संबंध लाल रंग खून का जो लाल रक्त कणिका अर्थात आरबीसी और दुग्ध संबंध श्वेत रंग श्वेत रक्त कणिका अर्थात डब्लूबीसी, जब तक आप जीवित हैं तब तक ये आपके शरीर में मौजूद हैं। इसीलिए श्रद्धावान संतान पितृपक्ष में दादा और नाना दोनों पक्ष के पूर्वजों का तर्पण करते हैं। हमारे पितृ पितृपक्ष में हमारे पास आकर यह देखते की हमारी संतान धर्म का पालन करते हुए सुखपूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं या नहीं। सामाजिक महत्व - इसकी महानता तब और बढ़ जाती है जब अपने पूर्वजों के साथ साथ ऐसे पितरों का भी तर्पण किया जाता है जिनको कोई तर्पण नहीं देता अथवा जिनके वंश में कोई न हो। साथ ही कौवा, गाय, कुत्ता और चींटी को भोजन कराना 'आत्मवत सर्वभूतेषु' की धारणा को प्रबल करता है।