काशी की प्राचीन परम्परा है मसाने की होली-कपाली बाबा
रिपोर्ट: आनंद सिंह अन्ना
वाराणसी। काशी की धार्मिक परम्पराओं में मसाने की होली का विशिष्ट और आध्यात्मिक महत्व है, यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि शिवत्व की अनुभूति और जीवन-मरण के दर्शन का अदभुत संगम है। महादेव की नगरी में नागा साधु, किन्नर समुदाय, अघोर साधक तथा सामान्य श्रद्बालु एक साथ सम्मिलित होकर इस अलौकिक परम्परा को साकार करते है। गृहस्य और विरक्तों का ऐसा दिव्य समागम केवल बाबा विश्वनाथ की काशी में ही सभव है।
काशी भगवान शिव द्वारा स्थापित अविमुक्त क्षेत्र है यह सामान्य नियमो और वर्जनाओ को स्वीकार नहीं करती है अतः काशी में मृत्यु नहीं मोक्ष है मसाने की होली हमें सिखाती है कि मृत्यु से भय कैसा, महादेव स्वयं महाकाल है उनके सानिध्य में मृत्यु भी एक परम आनन्द है इसीलिए काशी में मृत्यु का भी उत्सव मनाया जाता है यह अध्यात्म की चरम पराकाष्ठा है। मसाने की होली एक पवित्र धार्मिक आयोजन है। विगत वर्षों से इसमें कुछ अवांछित प्रवृत्तियों के प्रवेश की शिकायते सामने आई थी, किन्तु गत वर्ष से संत समाज एवं स्थानीय प्रशासन के सहयोग से आवश्यक सुधार किए गए हैं, जिससे इसकी गरिमा और पवित्रता पुन स्थापित हुई है।
पारस्परिक वाद्य यंत्रों की ध्वनि और शिवभक्ति के वातावरण में प्रत्येक सहभागी स्वय को शिवमय अनुभव करता है। प्राप्त पारम्परिक साक्ष्यों के अनुसार, इस उत्सव को संगठित एवं उत्साहवर्धक स्वरूप लगभग 350 वर्ष पूर्व बाबा काल भैरव के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ तथा बाबा कानाराम महाराज के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम एवं नाथ परंपरा के प्रसिद्ध संत योगी दीनानाथ के संयोजन में काशीको शैव संन्यासी परम्परा के साथ प्रारम्भ किया गया था। वक्त जानकारी हरिश्चंद्र घाट स्थित महाश्मशान पीठाधीश्वर चंडेश्वर उर्फ कपाली बाबा, गुलशन कपूर, बहादुर चौधरी ने संयुक्त रूप से पत्रकार वार्ता में दी।


