भोग और बंधुओं मे आसक्ति ही बंधन का कारण- जगद्गुरु शंकराचार्य नारायणानंद तीर्थ
रिपोर्ट: आनंद सिंह अन्ना
वाराणसी। अस्सी क्षेत्र स्थित श्री काशीधर्मपीठ, रामेश्वर मठ प्रांगण में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के तीसरे दिन अनंतश्री विभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज ने भक्तों को गहन आध्यात्मिक उपदेश मे बताया कि ब्रह्मा जी के पुत्र कर्दम ऋषि ने कठोर तपस्या द्वारा भगवान को कपिल रूप में प्राप्त किया। माता देवहूति, जो मनु-सतरूपा की पुत्री थीं, उनके साथ तप, संयम और ब्रह्मचर्य के प्रभाव से भगवान स्वयं पुत्र रूप में प्रकट हुए।
उन्होने कहा कि जहाँ संयम, त्याग, ब्रह्मचर्य और ईश्वर उपासना होती है, वहीं भगवान का अवतरण होता है। भगवान कपिल ने माता देवहूति को उपदेश दिया कि धन, भोग और बंधु में आसक्त मन बंधन का कारण है, जबकि ईश्वर में स्थित मन मुक्ति का मार्ग है। सनातन धर्म की परंपरा में त्याग और ईश्वर अनुभूति ही जीवन का परम लक्ष्य है। भगवान कपिल ने सांख्य शास्त्र का उपदेश देते हुए स्पष्ट किया कि धर्म तभी सफल होता है जब वह ईश्वर के आश्रय में किया जाए।
इस अवसर पर मुख्य यजमान देवमणि शुक्ला (मिर्जापुर) तदा काशीधर्मपीठ के निजी सचिव आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी महाराज, एडवोकेट विनय तिवारी, मनोज मिश्रा, पंकज शास्त्री सहित अन्य सैकडों श्रद्धालु भक्तगण उपस्थित रहे।


