चंचल मन के कारण ही भेद और अनेकता दिखता है-नारायणानंद तीर्थ
रिपोर्ट: आनंद सिंह अन्ना
वाराणसी। अस्सी स्थित श्री काशीधर्मपीठ, रामेश्वर मठ प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि धन, पद और भोग की आसक्ति ही मनुष्य के दुःख का मूल कारण है।
जब उद्धव जी को ज्ञात हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला संवरण कर परमधाम जाने वाले हैं, तब वे भगवान के पास पहुंचे। उस समय भगवान ने उन्हें भागवत धर्म के प्रचार-प्रसार का दायित्व सौंपते हुए उपदेश दिया कि मन को भगवान में लगाकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ। यह सम्पूर्ण संसार मन का ही विलास है। जब मन चंचल होता है, तब भेद और अनेकता दिखाई देती है, परन्तु मन के स्थिर होने पर यह अनेकता समाप्त हो जाती है। जो मनुष्य गुण और दोष दोनों से परे हो जाता है, वही माया से मुक्त हो सकता है।
इस अवसर पर कथा के यजमान देवमणि शुक्ला, पं अगस्त द्विवेदी, आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी महाराज, एडवो विनय तिवारी, आशीष शुक्ला, सौरभ तिवारी, मनोज मिश्रा, अरुण दुबे, शुशील शुक्ला सहित बडी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।



