Kashi ka News. अशांत विश्व में शांति का शाश्वत सूत्र-बुद्ध दर्शन-प्रो शर्मा

 अशांत विश्व में शांति का शाश्वत सूत्र-बुद्ध दर्शन-प्रो शर्मा

रिपोर्ट: आनंद सिंह अन्ना 

वाराणसी। भारतीय ज्ञान परम्परा का विराट आकाश अनेक दिव्य नक्षत्रों से आलोकित रहा है, किन्तु उनमें गौतम बुद्ध का व्यक्तित्व एक ऐसे चन्द्रमा के समान है, जिसकी शीतल और करुणामयी आभा युगों से मानवता के पथ को प्रकाशित करती आई है। बुद्ध पूर्णिमा का यह पावन पर्व केवल एक महापुरुष की जयन्ती नहीं, अपितु उस ज्ञान-ज्योति का उत्सव है, जिसने मानव जीवन के गूढ़तम प्रश्नों का अत्यन्त सरल, व्यावहारिक और सार्वभौमिक समाधान प्रस्तुत किया। भारतीय मनीषा में ‘ज्ञान’ का आशय केवल बौद्धिक प्रगल्भता नहीं, बल्कि जीवन के दुःखों के निवारण का उपाय है। 

इसी सत्य का साक्षात्कार गौतम बुद्ध ने अपने आत्मानुभव से किया और उसे ‘धम्म’ के रूप में विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन का मूल स्वरूप दुःखमय है, किन्तु यह दुःख अनिवार्य नहीं-उसका कारण है, और उसका निवारण भी सम्भव है। यह बोध भारतीय ज्ञान परम्परा की उस व्यावहारिकता को उद्घाटित करता है, जो केवल सिद्धान्तों में नहीं, बल्कि जीवन-परिवर्तन में विश्वास रखती है। बुद्ध का समग्र उपदेश भारतीय ज्ञान परम्परा के सातत्य और नवोन्मेष का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने वैदिक परम्परा के गहन दार्शनिक तत्वों-कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष-को स्वीकार करते हुए उन्हें सरल, सुगम और सर्वसुलभ रूप प्रदान किया। उनका ‘मध्यम मार्ग’ न तो कठोर तपस्या का आग्रह करता है, न ही भोग-विलास की प्रवृत्ति का समर्थन करता है; वह जीवन के सन्तुलित, संयमित और सजग आचरण की शिक्षा देता है। 

आज जब विश्व विभाजन, संघर्ष और असहिष्णुता से जूझ रहा है, तब उनका सन्देश “अप्प दीपो भव” व्यक्ति को आत्म प्रकाश की ओर उन्मुख करता है और समष्टि में शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। संपूर्णानंद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा के इस पवित्र पर्व को केवल एक अनुष्ठान के रूप में न मनाएँ, बल्कि उसके मूल संदेश को आत्मसात् करें। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि वास्तविक प्रगति बाह्य उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आन्तरिक परिष्कार में निहित है और यही भारतीय ज्ञान परम्परा का शाश्वत सन्देश है।