भाविप ने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर किया यज्ञ।
रिपोर्ट: आनंद सिंह अन्ना
वाराणसी। भारत विकास परिषद् काशी प्रदेश प्रान्त उत्तर मध्य क्षेत्र-द्वितीय के नीलकण्ठ शाखा द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण संरक्षण हेतु वृहद राष्ट्रभृत्ति यज्ञ का आयोजन जिला आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान प्रमोद आर्य आर्षेय के आचार्यत्व व प्रान्तीय गतिविधि सह-संयोजक (पर्यावरण) की रेणुका सिंह व महामना शाखाध्यक्ष डॉक्टर बी एन रॉकी, साथ ही शाखा गतिविधि संयोजक सुनील अग्रहरि, शाखा गतिविधि सह-संयोजक त्रय महाबीर प्रसाद श्रीवास्तव, प्रवीण श्रीवास्तव, उमाशंकर जायसवाल, शाखा सचिव संजीव श्रीवास्तव व डॉक्टर अमित पाण्डेय, जिला सभा के सदस्यों के साथ किया। प्रधान आर्षेय ने कहा कि हमारे ऋषि मुनियों ने लाखों वर्ष पूर्व ही पर्यावरण के संरक्षण को जान लिया था व आने वाली पीढ़ियों को यज्ञ का व्यवस्था दिया, आज वैज्ञानिकों ने भी यज्ञ (हवन) को मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं अपितु यह वायुशोधन, किटाणुनाशक और मानसिक शान्ति का एक प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक माध्यम बताया है तथा यज्ञ पर रिसर्च करने के पश्चात् यज्ञ की महत्ता को स्वीकार किया है। किसी की भी मृत्यु होने पर शव के पास गोइठा अर्थात् कंडे जलाए जाते हैं और यदि उसके ऊपर सुगन्धित व पुष्टिदायक औषधियों को डाला जाता है तो उससे वातावरण में उपस्थित विषाणुओं का नाश होता है, जिसे कि लोग नहीं जानते हैं और परम्परा मानते हैं।
जबकि यह वायु शोधन, कीटाणुनाश और मानसिक शान्ति का एक प्राकृतिक और वैज्ञानिक माध्यम है। यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली जड़ी-बूटियाँ और घी अग्नि के संपर्क में आकर सूक्ष्म कणों के रूप में वातावरण में फैल जाते हैं जो कि प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर (वायु शोधक) का कार्य करता है। यज्ञ में आम की लकड़ी, कपूर, तिल, जौ और गाय के घी का उपयोग होता है। जब ये सामग्रियाँ जलती हैं, तो इनसे वाष्पशील तेल निकलते हैं, जो हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करने में मदद करते हैं, सूक्ष्म कणों और कार्बन डाइऑक्साइड में कमी करता है । यह आम, पीपल, आदि की लकड़ियों को जलाने हेतु ऋषियों ने वृक्ष को काटकर नहीं अपितु सूखी हुई टहनियों को लेकर उनसे यज्ञ करने की व्यवस्था दीं हैं । शोधकर्ताओं द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे दिल्ली में किए गए प्रयोग) में पाया गया है कि यज्ञ के दौरान उत्पन्न धुआं आरंभ में कुछ कण बढ़ाता है, लेकिन यज्ञ के तुरन्त बाद वातावरण में सूक्ष्म कणों और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की जाती हैं। घी से बने सूक्ष्म कण अन्य प्रदूषकों को अपने साथ चिपकाकर सतह पर बैठा देते हैं। हवन में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों के जलने से फॉर्मेल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है, जो वायुमंडल में मौजूद दुर्गंध और कई हानिकारक जहरीले रसायनों को नष्ट कर देती है । सुगंध और मानसिक शान्ति हवन सामग्री और जड़ी-बूटियों के जलने से उत्पन्न सुगंधित धुएँ का श्वसन तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह मस्तिष्क को शान्त करने और मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होता है। यज्ञ के बाद बची हुई राख (भस्म) में पोटाश, कैल्शियम और फास्फोरस जैसे खनिज होते हैं, यह राख पौधों के लिए एक बेहतरीन प्राकृतिक उर्वरक के रूप में कार्य करती है और जल स्रोतों को शुद्ध करने में भी मदद करती है।
इस कार्यक्रम में जिला सभा से चन्द्रदीप आर्य, मनोहर आर्य, राजकुमार वैद्य, सुनील जायसवाल आदि लोग उपस्थित रहें। शाखाध्यक्ष रवि प्रकाश बरनवाल ने सभी को कार्य दिवस के उपरान्त भी उपस्थित होकर कार्यक्रम सफल बनाने हेतु धन्यवाद ज्ञापित किया। उधर बाल संस्कार के अंतर्गत विश्व पर्यावरण दिवस पर शाखाध्यक्ष रवि प्रकाश बरनवाल ने बच्चों से भी यज्ञ के सूक्ष्म रूप को घी के दीपक जलाकर यज्ञ के महिमा के बारे में बताया व पत्रक वितरित किया। आहुति सिंह ने गीता के श्लोक को लिखवा कर उसके अर्थ की व्याख्या कियें। इस कार्यक्रम में ब्रह्मकुमारी शिक्षा संस्थान की मुख्य शिक्षिका विमला सिंह, अध्यापिकाएँ व अध्यापक आदि उपस्थित रहें । प्रान्तीय सचिव ने बच्चों को चाकलेट, शाखा कोषाध्यक्ष ने शरबत व गतिविधि संयोजक संस्कार की आहुति सिंह ने मालपूआ वितरित किए।


