जनेऊ की गांठ में ब्रह्म स्थित होते हैं-प्रो महेन्द्र पांडेय
रिपोर्ट: आनंद सिंह अन्ना
वाराणसी। गुरु (शिक्षक) संस्कृत-संस्कार और संस्कृति के परिदृश्य में विद्यार्थियों को उत्तम कर्म करने का पाठ पढ़ायें , शिक्षक श्रेष्ठ गुरु बन, श्रेष्ठ विद्यार्थियों का जन्म दें, जब श्रेष्ठ विद्यार्थी होंगे तभी श्रेष्ठ भारत का निर्माण होगा। वही कर्णधार भारत के परिदृश्य को विश्व फलक पर स्थापित करेंगे। उक्त विचार आज सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के वेद विभाग के अंतर्गत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन राष्ट्र कल्याण एवं संस्कृत परम्परा के अनुसार श्रावणी उपाकर्म (ऋषि पूजन) पर संस्कृत जगत को आशीर्वाद देते हुये कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने व्यक्त किया। प्रो महेन्द्र पांडेय ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि इस दिन सुबह दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के बाद स्नान करते हैं। फिर कोरे जनेऊ की पूजा करते हैं। जनेऊ की गांठ में ब्रह्म स्थित होते हैं। उनके धागों में सप्तऋषि का वास माना जाता है। ब्रह्म और सप्तऋषि पूजन के बाद नदी या सरोवर में खड़े होकर ब्रह्मकर्म श्रावणी संपन्न होती है। पूजा के बाद उसमें शामिल जनेऊ में से एक जनेऊ पहन लेते हैं और बाकी के जनेऊ रख लेते हैं। पूरे वर्षभर जब भी जनेऊ बदलने की आवश्यकता होती है तो श्रावणी उपाकर्म के पूजन वाले जनेऊ को ही पहनते हैं।
श्रावणी उपाकर्म के लिए वेद विभागाध्यक्ष प्रो महेंद्र नाथ पांडेय सहित अनेक अध्यापकों और विद्यार्थियो ने प्रातः 9:30 बजे गंगा तट पर स्नान आदि के साथ विधि पूर्वक गण पूजन किया। सप्तऋषि, गणेश और गौरी पूजन-उसके बाद विश्वविद्यालय के वेद विभाग में मध्याह्न 10:30 बजे कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा के आशीर्वादन एवं प्रो रामपूजन पाण्डेय के अध्यक्षता में षोडशोपचार विधि से संस्कृत, संस्कृति और संस्कार तथा दया, करुणा, राष्ट्रीयता के भाव के लिये सप्तऋषि, गौरी-गणेश पूजन किया गया।
वेदविभागाध्यक्ष प्रोफेसर महेंद्र पाण्डेय के निर्देशन, डाक्टर विजय कुमार शर्मा आचारत्व एवं संयोजकत्व में सम्पन्न हुआ। उस दौरान प्रो रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो रामपूजन पाण्डेय, प्रो महेंद्र पान्डेय, प्रो दिनेश कुमार गर्ग, डॉ मधुसूदन मिश्र, डॉ ज्ञानेन्द्र सांपकोटा, डॉ पप्पू चौबे, डॉ संजय कुमार तिवारी, सन्तोष दुबे एवं भारी संख्या में छात्र आदि उपस्थित थे।


