यह तिरंगा भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के समर्पण का प्रतीक है- कुलपति प्रो शर्मा
रिपोर्ट: आनंद सिंह अन्ना
वाराणसी। असंख्य बलिदानों व लम्बी लड़ाई के बाद आज हमारा तिरंगा खुले आसमान में फहराया है। हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने तिरंगा जो भारत के ऑन बान और शान का प्रतिक है। उसको फहराने के लिए सदियों तक संघर्ष करते रहें, असंख्य बलिदान दिये, जेलों में गये, असंख्य यातना सही लेकिन माँ भारतीय के लिए जो मर -मिटने का संकल्प था उसे कभी कम होने नहीं दिया। उस संकल्प कोई लेकर ज़ब दुनिया सो रही थी तो भारत उस समय जाग रहा था और भारत का यह तिंरगा खुले आसमान में लहराने के लिए तत्पर और लालायित था। उक्त विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने ऐतिहासिक मुख्य भवन के समक्ष 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अध्यक्षीय ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि आज का दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि उन असंख्य अमर शहीदों के त्याग, तपस्या, संघर्ष और बलिदान को स्मरण करने का पावन अवसर है, जिनकी शहादत से हमें स्वतंत्र भारत में सांस लेने का अधिकार मिला। इस आजादी के लिए न जाने कितनी माताओं ने अपने लाल खोए, कितनी बहनों ने अपने भाई और कितनी नारियों ने अपना सुहाग खोया। वर्ष 1929 के लाहौर अधिवेशन में लिए गए पूर्ण स्वराज के संकल्प से लेकर 15 अगस्त 1947 को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति तक का सफर असंख्य बलिदानों से भरा रहा। यह वह ऐतिहासिक क्षण था, जिसमें भगत सिंह की देशभक्ति, लाला लाजपत राय का संघर्ष, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ओजस्वी उद्घोष, लोकमान्य तिलक की स्वराज की ललकार और असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों का त्याग समाहित था। स्वतंत्रता के साथ विभाजन की असहनीय पीड़ा भी मिली, किंतु तिरंगे के उन्मुक्त गगन में लहराने का वह गौरवपूर्ण क्षण भारत की आत्मा का अमर प्रतीक बन गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता हमारे पूर्वजों की अमूल्य विरासत है और इसकी रक्षा करना हम सभी का परम दायित्व है। आज का दिन आत्मावलोकन और संकल्प का दिन है; हमें अपने स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का भारत बनाने के लिए ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ कार्य करते हुए विकसित, आत्मनिर्भर, समरस, संस्कारित और गौरवशाली भारत के निर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देना चाहिए -यही अमर बलिदानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।
कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि यह तिरंगा साधारण तिरंगा नहीं है,यह हमारे भारत की आत्मा है, हमारी साँस्कृतिक निधि की धरोहर है, यह तिरंगा भारत के चेतना की प्रतीक है, यह तिरंगा भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के समर्पण का प्रतीक है।स्वतंत्रता का अर्थ है अपने बनाये हुये विधान के अंदर कार्य करने के हम प्रवृत्त हों, स्व दायित्वों का समर्पित भाव से कार्य करें। यह देश समान्य देश नहीं है जहां छह मौसम, छह ऋतुयें हैं।दुनियां में यह देश पवित्र नदियों, पवित्र ग्रंथों वाला देश है। यही वह देश है जंहा ऋषि परम्परा है। सौभाग्य हमारा की हम इस देश के नागरिक हैं। दुनियां बूढी हो रही है, भारत जवान हो रहा है। यह जवान भारत की ताकत को दुनियां भर में अग्रणी स्थान मिल रहा है,हमे प्रथम स्थान पर सुना जाता है। इस संस्था की भूमिका स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने में अपने आपको आगे पाया गया जिसमे यहां के विद्यार्थियों में चन्द्रशेखर आजाद ने अपने जीवन को समर्पित कर भारत को आजाद कराया। यह प्राच्यविद्या का केन्द्र दुनियां मे सबसे प्राचीन शिक्षा मन्दिर है,हमारी भूमिका अपनी संस्कृति एवं भारतीयता के के लिए अति महत्वपूर्ण है।यही हमारी देशभक्ति होगी। यह देश सदैव विश्व बंधुत्व के भाव को लेकर चला है,हम अपने आचरण से सभी को साथ लेकर चलने की भावना के साथ से आगे बढ़े।
इस अवसर पर कुलसचिव राकेश कुमार, परीक्षा नियंत्रक दिनेश कुमार, प्रो जितेन्द्र कुमार, प्रो रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो सुधाकर मिश्र, प्रो हीरक कांत चक्रवर्ती, शैलेश कुमार मिश्र,प्रो रमेश प्रसाद, प्रो राजनाथ, प्रो अमित कुमार शुक्ल, प्रो विजय कुमार पाण्डेय, प्रो दिनेश कुमार गर्ग, डॉ मधुसूदन मिश्र, डॉ विजेंद्र आर्य, डॉ दुर्गेश पाठक. डॉ नितिन आर्य सहित संस्था के अन्य अध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी एवं विद्यार्थियों ने सहभाग किया।


